जहां गंगा की धारा भी बदल लेती है दिशा,धर्मराज युधिष्ठिर ने दिए थे यक्ष के प्रश्नों के उत्तर 

पंचेवली का पंचलेश्वर महादेव

 

जहां गंगा की धारा भी बदल लेती है दिशा,धर्मराज युधिष्ठिर ने दिए थे यक्ष के प्रश्नों के उत्तर

 

डाॅ. शिवेश्वर दत्त पाण्डेय

 

हरिद्वार जनपद की पहचान केवल हर की पैड़ी और गंगा आरती तक सीमित नहीं है। जनपद के दूरस्थ ग्रामीण अंचलों में भी आस्था, पुरातन परंपराओं और प्रकृति के अद्भुत मेल को अपने भीतर समेटे अनेक तीर्थस्थल आज भी विद्यमान हैं। इन्हीं में लक्सर क्षेत्र के पंचेवली गांव के निकट स्थित प्राचीन पंचलेश्वर महादेव मंदिर एक ऐसा तीर्थ है, जिसकी धार्मिक महत्ता के साथ-साथ यहां बहने वाली गंगा की धारा इसे विशिष्ट पहचान प्रदान करती है।

पंचलेश्वर महादेव को लेकर स्थानीय जनमानस में प्राचीन काल से अनेक मान्यताएं प्रचलित हैं। प्रकाशित विवरणों में इस मंदिर को महाभारतकालीन पांडवों से जोड़ा गया है। मान्यता है कि अज्ञातवास के दौरान पांचों पांडव इस क्षेत्र में आए थे और भगवान शिव की आराधना की थी। मंदिर में स्थित शिवलिंग को भी स्वयंभू माना जाता है। श्रावण मास में यहां दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचकर भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं।

पंचलेश्वर महादेव की सबसे बड़ी विशेषता यहां गंगा की धारा को लेकर कही जाती है। स्थानीय लोग इस धारा को ‘उल्टी गंगा’ के नाम से पुकारते हैं। सामान्यतः गंगा की धारा जिस दिशा में प्रवाहित होती दिखाई देती है, उसके विपरीत पंचेवली क्षेत्र में लगभग आधा किलोमीटर तक गंगा की धारा के पूर्व से पश्चिम की ओर बहने का उल्लेख प्रकाशित रिपोर्टों में मिलता है। इसी कारण यह स्थान श्रद्धालुओं के बीच विशेष कौतूहल और आस्था का केंद्र बना हुआ है। इसके बाद धारा पुनः उत्तर से दक्षिण दिशा की ओर प्रवाहित होने की बात भी रिपोर्टों में कही गई है।

‘उल्टी गंगा’ का यह संबोधन धार्मिक लोकविश्वास का हिस्सा है। नदी की किसी स्थानीय धारा का दिशा-परिवर्तन भू-आकृति, नदी की पुरानी धारा, तटों की बनावट और जल-प्रवाह जैसी भौगोलिक परिस्थितियों से भी संबंधित हो सकता है। इसलिए इस विशेषता को आस्था के साथ-साथ प्रकृति की एक अनूठी भौगोलिक घटना के रूप में देखना अधिक उचित है। यही संतुलित दृष्टि इस स्थल की महत्ता को और बढ़ाती है।

पंचलेश्वर महादेव का संबंध पांडवों से जोड़े जाने के कारण यह स्थान महाभारत की अनेक स्मृतियों को भी जीवंत करता है। महाभारत में पांडवों के जीवन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रसंग यक्ष प्रश्न के नाम से प्रसिद्ध है। वनवास के दौरान जब पांडव एक जलाशय के पास पहुंचे, तब एक अदृश्य यक्ष ने उन्हें जल ग्रहण करने से पहले अपने प्रश्नों के उत्तर देने की चुनौती दी। अपने भाइयों के विपरीत परिस्थितियों में युधिष्ठिर ने धैर्य और विवेक के साथ यक्ष के प्रश्नों का उत्तर दिया। धर्म, कर्तव्य, जीवन, मृत्यु, मनुष्य के आचरण और सत्य से जुड़े वे प्रश्न आज भी भारतीय चिंतन परंपरा में अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

यक्ष प्रश्न का मूल संदेश केवल प्रश्नों के उत्तर देने तक सीमित नहीं है। वह मनुष्य को यह समझाता है कि कठिन परिस्थितियों में शक्ति से अधिक महत्वपूर्ण विवेक, धैर्य, सत्य और धर्मबुद्धि होती है। पंचेवली में पांडवों से जुड़ी लोकमान्यता के संदर्भ में यक्ष प्रश्न की स्मृति इसलिए भी अर्थपूर्ण हो जाती है कि महाभारत के पांडव केवल युद्ध के नायक नहीं थे, बल्कि भारतीय परंपरा में वे संघर्ष, तप, धैर्य और धर्म के प्रतीक भी माने जाते हैं।

पंचलेश्वर महादेव के संबंध में पांडवों की स्थापना और अज्ञातवास की कथा ऐतिहासिक प्रमाण से अधिक स्थानीय धार्मिक परंपरा और लोकविश्वास के रूप में देखी जानी चाहिए। किंतु लोकमान्यताएं भी किसी क्षेत्र की सांस्कृतिक स्मृति का महत्वपूर्ण हिस्सा होती हैं। पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही ऐसी कथाएं किसी स्थान को केवल भौगोलिक पहचान नहीं देतीं, बल्कि उसे भावनात्मक और आध्यात्मिक पहचान भी प्रदान करती हैं।

इस तीर्थ की एक और विशेषता यह है कि यहां शिव और गंगा का संबंध एक साथ दिखाई देता है। भारतीय धार्मिक चेतना में भगवान शिव और मां गंगा का संबंध अत्यंत गहरा है। गंगा के पृथ्वी पर अवतरण की कथा में स्वयं भगवान शिव की जटाओं का उल्लेख आता है। ऐसे में गंगा तट पर स्थित प्राचीन शिवालय श्रद्धालुओं के लिए स्वाभाविक रूप से विशेष आस्था का केंद्र बन जाता है।

पंचलेश्वर महादेव में श्रावण मास के दौरान विशेष धार्मिक गतिविधियां होती हैं। महाशिवरात्रि और गंगा दशहरा जैसे पर्वों पर भी यहां श्रद्धालुओं के पहुंचने और धार्मिक आयोजनों की परंपरा का उल्लेख मिलता है। स्थानीय ग्रामीणों और श्रद्धालुओं की आस्था ने इस प्राचीन स्थल को आज तक जीवंत बनाए रखा है।

हालांकि समय के साथ गंगा की धारा में हुए परिवर्तनों का प्रभाव इस क्षेत्र पर भी पड़ा है। एक प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार बिशनपुर कुंडी के निकट गंगा की धारा रोके जाने के बाद पंचेवली क्षेत्र में गंगा की प्रत्यक्ष धारा का स्वरूप प्रभावित हुआ और तीर्थस्थल भी उपेक्षा का शिकार हुआ। बाद में स्थानीय ग्रामीणों ने मंदिर के साफ-सफाई और सौंदर्यीकरण के प्रयास किए।

यही कारण है कि पंचलेश्वर महादेव का संरक्षण केवल मंदिर के भवन तक सीमित नहीं होना चाहिए। इस पूरे क्षेत्र को धार्मिक, सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत के रूप में देखा जाना चाहिए। मंदिर परिसर की स्वच्छता, पहुंच मार्ग, प्रकाश व्यवस्था, पेयजल, पर्यावरण संरक्षण, गंगा की पुरानी धाराओं का दस्तावेजीकरण और पांडवों से जुड़ी स्थानीय परंपराओं का संकलन इस तीर्थ की विरासत को सुरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

पंचेवली का पंचलेश्वर महादेव हमें यह भी याद दिलाता है कि भारत की सांस्कृतिक विरासत केवल बड़े नगरों और प्रसिद्ध तीर्थों में ही नहीं बसती। गांवों की पगडंडियों, प्राचीन शिवालयों, नदी की धाराओं और पीढ़ियों से चली आ रही लोककथाओं में भी हमारी सभ्यता की अनेक अनकही कहानियां सुरक्षित हैं।

एक ओर स्वयंभू शिवलिंग के प्रति श्रद्धा, दूसरी ओर पांडवों से जुड़ी लोकमान्यता और तीसरी ओर गंगा की धारा का असामान्य प्रवाह—इन तीनों का संगम पंचेवली के पंचलेश्वर महादेव को विशिष्ट बनाता है। यहां की ‘उल्टी गंगा’ लोगों के लिए कौतूहल भी है और आस्था भी; पांडवों की कथा स्मृति भी है और प्रेरणा भी; जबकि यक्ष प्रश्न हमें याद दिलाता है कि जीवन के कठिनतम मोड़ पर भी मनुष्य को अपने विवेक, धैर्य और धर्म का साथ नहीं छोड़ना चाहिए।

पंचेवली का पंचलेश्वर महादेव इसलिए केवल एक प्राचीन शिव मंदिर नहीं, बल्कि आस्था, लोकस्मृति, महाभारत की परंपरा और प्रकृति के अद्भुत संगम का जीवंत प्रतीक है। आवश्यकता है कि इस विरासत को श्रद्धा के साथ समझा जाए, वैज्ञानिक दृष्टि से अध्ययन किया जाए और आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखा जाए। यही इस अद्भुत तीर्थ के प्रति सच्ची पुष्पाजंली होगी।