अनुराग लक्ष्य, 12 सितंबर
सलीम बस्तवी अज़ीज़ी
मुम्बई संवाददाता ।
सदियाँ गुज़र गईं लेकिन इश्क मोहब्बत प्यार और वफ़ा का कारवाँ आज भी उतनी ही खूबसूरती के साथ रवाँ दवाँ है, जितनी शीरी फरहाद, लैला मजनू के ज़माने में हुआ करता था। तभी तो इश्क मोहब्बत प्यार और वफ़ा की दासतान अब भी ज़िंदा है। शायरी तब भी हुआ करता थी और आज भी हो रही है, और दुनिया रहने तक होती रहेगी। ऐसे ही इश्क मोहब्बत प्यार और वफ़ा की दासतान लेकर आज साहिल प्रतापगढ़ी फिर अपनी एक खूबसूरत ग़ज़ल के साथ हाज़िर हैं।
दिल पे कयामत ढाते क्यों हो,
छुप छुपकर मुस्काते क्यों हो ?
इतना भी इतराते क्यों हो,
हमसे यूॅं कतराते क्यों हो ?
भूल गये हमको तुम लेकिन,
याद हमें तुम आते क्यों हो ?
रूक जाओ बस और ज़रा सा,
चैन चुरा कर जाते क्यों हो ?
कुछ हम बोलें कुछ तुम बोलो,
हमसे तुम शर्माते क्यों हो ?
ऐसी नज़ाकत फूलों वाली,
सच कहिए दिखलाते क्यों हो ?
फूल से भंवरा पुॅंछ रहा है,
मन को तुम ही भाते क्यों हो ?
पूॅंछ पड़ी भौंरे से कली तुम,है
डाली पे मंडराते क्यों हो ?
गीत वफाओं का तुम *साहिल*,
महफ़िल महफ़िल गाते क्यों हो ?
पेशकश,,,,, सलीम बस्तवी अज़ीज़ी