अनुराग लक्ष्य, 10 सितंबर
सलीम बस्तवी अज़ीज़ी
मुम्बई संवाददाता ।
शायरी ने जब जब किसी के दिल को अपना आशियाना बनाया है, तब तब वह दिल गुलाब के मानिंद खिल उठा है। चाहे वो किसी सहरा या बयाबाँ का ही मुसाफ़िर क्यों न हो। उसकी खुशबू से हर दिल मुउत्तर हो ही जाता है। यह अलग बात है कि शायरी बहुत ख़ून जलाती है, तभी तो ज़िंदगी के अनमोल खयालात और जज़्बात की अक्कासी शायर अपनी शायरी के ज़रिए कर जाता है।
इसी सच्चाई की चादर ओढ़े हमारे बीच एक ऐसा शायर भी है, दुनिया ए अदब जिसे तौआब अली के नाम से जानती और पहचानती है। आज इश्क़ ओ मोहब्बत से लबरेज़ ऐसे ही शायर तौआब अली की एक ख़ास ग़ज़ल से आपको रूबरू करा रहा हूँ ।
ऐसे अपनों पे यूँ इल्ज़ाम लगाया न करो ,
हम तुम्हारे हैं हमें इतना सताया न करो ।
भूल जाओ मुझे तुमसे नहीं शिकवा कोई ,
शर्त इतनी है मुझे याद भी आया न करो ।
रोज दिल देते हो और देके मुकर जाते हो ,
दिल ये नाजुक है इसे और दुखाया न करो ।
मुझसे मिलने के लिए आओ न आओ लेकिन ,
मिल के गैरों से मेरे दिल को जलाया न करो ।
अश्क-ए-गम में न डूब जाए ये चाहत मेरी ,
अपने दीवाने को इतना भी रुलाया न करो ।
तेरी चाहत ने ही बर्बाद किया है मुझको,
मिट चुके हैं जो उन्हें और मिटाया न करो।
लोग हंस देते हैं सुनकर यह कहानी मेरी,
किस्स-ए-दर्द अली सबको सुनाया न करो।
पेशकश,,,, सलीम बस्तवी अज़ीज़ी