बकरा ईद की पूर्व संध्या पर बस्ती के बाज़ारों में बढ़ी रौनक, कपड़े और सेवइयों की दुकानों में विशेष खरीदारी,,,,,,,

अनुराग लक्ष्य, 28 मई
सलीम बस्तवी अज़ीज़ी
मुम्बई संवाददाता ।
इस्लामी महीने का आखिरी महीना ईदुल अज़हा हज़रत ए इब्राहीम अलहिस्सलाम और उनके बेटे हज़रत ए इस्माईल अलहिस्सलाम के त्याग और बलिदान को दर्शाता रहेगा । जब तक यह दुनिया क़ायम रहेगी, एक बाप और बेटे की दास्तान भी ज़िन्दा रहेगी।
ईदुल अज़हा हज़रत ए इब्राहीम अलहिस्सलाम और उनके बेटे हज़रत ए इस्माईल अलहिस्सलाम के मुहब्बत की वोह दास्तान सुनाती है जिसमें एक बाप ने अल्लाह की रज़ा के लिए अपने बेटे की कुर्बानी देने के लिए मेना की वादियों में पहुंच गए। लेकिन यह खुदा की तरफ से यह एक आजमाइश थी। और इस आजमाइश में अल्लाह के नबी हज़रत ए इस्माईल अलहिस्सलाम खरे उतरे। इसी लिए अल्लाह ने एक बाप के हाथों अपने बेटे की गर्दन पर छुरी नहीं चलने दी, और बेटे की गर्दन की जगह अल्लाह के हुक्म से फरिश्तों ने एक दुम्बा रख दिया।
इसी अकीदत और मुहब्बत को ज़िंदा रखने का नाम है कुर्बानी। जिसे इस्लाम धर्म के मानने वाले आज भी कुर्बानी पेश करके एक बाप और बेटे की सच्ची मुहब्बत की मिसाल पेश करते हैं।
इस अवसर पर बस्ती के बाज़ारों में बढ़ी रौनक से दुकानदारों को राहत महसूस हुई। शाम होते ही बाज़ार की रौनक बढ़ी और देखते देखते ही देखते कपड़े, और सेवइयों की दुकानों के साथ जूते और श्रृंगार की दुकानों में विशेष खरीदारी करते हुए लोग नज़र आए ।
यह अलग बात है कि बकरों की खरीदारी में तेज़ होने की वजह से लोग अपनी पसंद के बकरों को नहीं खरीद पा रहे हैं। वजह बकरों की बढ़ी कीमतें । इस साल साधारण बकरे भी 20, 25 हज़ार से लेकर बड़े बकरे एक लाख तक बिक रहे हैं। जिससे बकरों की कुर्बानी करने वालों में निराशा दिखी। फिर भी लोगों ने अपनी सच्ची मुहब्बत और अकीदत को पेश करने के लिए अपनी हैसियत से ज़्यादा रकम देकर बकरे खरीदकर कुर्बानी की तैयारियों में मशगूल दिखाई दिए ।