आज सुनाऊंँ व्यथा पुरानी नारी की है अजब कहानी

गीत

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आज सुनाऊंँ व्यथा पुरानी नारी की है अजब कहानी।

समझ सका ना कोई जग में कैसे बीती है जिंदगानी।।

 

बिना खिले ही तोड़ी जाती नन्ही कली नहीं मुस्कराती ।

भाग्य विधाता क्या लिख डाला अपने ही बन बैठे घाती।।

आँखें नहीं खोल पाई है जानी मगर हुई अंजानी

समझ सका ना कोई जग में,कैसे भी थी जिंदगानी।।

 

सबको हँस हँस खूब खिलाती, वक्त पड़े भूखी सो जाती।

आलस नहीं कभी करती है, करे सृजन नव दिन और राती।।

दर्दों में भी मुस्काती है पी जाती आँखों का पानी

समझ सका ना कोई जग में, कैसी बीती जिंदगानी।।

 

 

ममता की मूरत कहलाती, बिना आह सबकुछ सहजाती।

सब कुछ सहन करे निज घर में, नहीं वेदना को कह पाती ।।

आशा और विश्वास लिए मन, सदा भुलाती बात पुरानी

समझ सका ना कोई जग में, कैसे बीती जिंदगानी।।

 

अंजना सिन्हा “सखी ”

रायगढ़