इक समुंदर में समाने के लिए जिंदा हूं।।

ग़ज़ल

दुनिया फ़ानी है बताने के लिए ज़िन्दा हूँ।
फिर वहीं लौट के जाने के लिए ज़िन्दा हूँ।।

आखिरी लफ़्ज़ यही निकले नदी के मुंह से।
इक समुंदर में समाने के लिए जिंदा हूं।।

दिलके तारों की तू आवाज़ अभी भी है दोस्त।
बस यही दर्द सुनाने के लिए ज़िन्दा हूँ।।

जिसकी छाया से तपन दूर हो जाए मन की।
अब वही नख्ल लगाने के लिए जिंदा हूं।।

लोग इस दुनिया में अपनों के लिए जीते हैं।
और इक मैं हूं ज़माने के लिए जिंदा हूं।।

टूट के जिसने मुझे तोड़ दिया अंदर तक।
फिर वही ख्वाब सजाने के लिए जिंदा हूं।।

शाइरी रूह में बस जाए किसी की हर्षित।
ऐसे अशआर सुनाने के लिए जिंदा हूं।।

विनोद उपाध्याय हर्षित