22 सितंबर गैंडा दिवस

22 सितंबर गैंडा दिवस

 

कभी-कभी इंसान का गुण ही उसकी जान का दुश्मन बन जाता है, यही बात गैंडे पर भी लागू होती है। उसके सींग से अनेकों दवाइयां, प्रसाधन सामग्री आदि का निर्माण होता है, सींग की अंगूठी चांदी में बनवाकर पहनने से गैस संबंधी समस्याओं से छुटकारा मिलता है यानी गैंडे का सींग ही उसकी जान का सबसे बड़ा दुश्मन बन गया है और इसी सींग के चलते उसका अवैध शिकार किया जाता है। विदेशों में तो इस सींग की जबरदस्त मांग है।

गैंडे के वैश्विक संरक्षण के उद्देश्य से ही विश्व वन्यजीव कोष, दक्षिण अफ्रीका ने गैंडा-दिवस मनाने की घोषणा की और 22 सितंबर 2010 को पहली बार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विश्व गैंडा (राइनो) दिवस मनाया गया।

वनों की निरंतर कटाई और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं से गैंडे के आवास को खतरा बना रहता है। जब इनके जंगल बाढ़ के पानी से भर जाते हैं तो ये शहरों की तरफ पलायन करते हैं फलस्वरूप कभी दुर्घटना का शिकार हो जाते हैं।कभी इंसानी बस्तियों में घुस जाने पर इनकी इंसानों के साथ जबरदस्त भिड़ंत भी होती है। कभी इस भिड़ंत में गांव वालों के क्रोध का शिकार बनकर जान से हाथ धो बैठते हैं। निश्चित तौर पर जानवर इंसानों की बस्ती में तभी आते हैं जब इंसान उनके आवास को तोड़ देते हैं, इस बात को हम इंसानों को समझना ही पड़ेगा।

गैंडे की विश्व में पाँच प्रजातियाँ हैं-

1. एक सींग वाला गैंडा — भारत व नेपाल में

2. ब्लैक गैंडा — अफ्रीका में

3. व्हाइट गैंडा — अफ्रीका में

4. जावा राइनो — इंडोनेशिया, जावा में

5. सुमात्रा राइनो — इंडोनेशिया, सुमात्रा में

वन हॉर्न राइनो यानी एक सींग वाला गैंडा सर्वाधिक रूप से भारत में पाया जाता है और उसमें भी अधिकांशतः असम के जंगलों में पाया जाता है।

ऑपरेशन राइनो प्रोटेक्शन फोर्स की तैनाती और शिकारियों पर थर्मल ड्रोन से नज़र रखने तथा सैटेलाइट मॉनिटरिंग से गैंडे के शिकार में काफ़ी कमी तो आयी ही है, इनकी संख्या भी बढ़ी है। 2021 में असम सरकार ने सार्वजनिक तौर पर अवैध रूप से ज़ब्त किये गये सींगों को जला दिया ताकि यह संदेश जनता तक पहुॅंचे कि गैंडा तस्करी किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

इसके अलावा राजमार्गों (कॉरिडोर) पर वाहन की गति सीमा न केवल निर्धारित की गयी है बल्कि वह रिकार्ड भी होती है और गति ज़्यादा होने पर जुर्माना भी लिया जाता है। इसके अलावा सेफ्टी ज़ोन से आने जाने वाले वाहनों द्वारा हॉर्न बजाने पर पाबंदी है ताकि गैंडों के आराम में खलल न पड़े।

असम के चार राष्ट्रीय उद्यानों में गैंडों की संख्या 2900 है जो वैश्विक गैंडा आबादी का 70% है। काजीरंगा नेशनल पार्क में सर्वाधिक 2613 गैंडे, मानस नेशनल पार्क में 40-50 गैंडे, ओरंग राष्ट्रीय उद्यान में 125 गैंडे और पोबितोरा वन्यजीव अभयारण्य में लगभग 107 गैंडे हैं। इन गैंडों को देखने के लिए दुनिया भर से पर्यटक आते हैं।

इसके अलावा पश्चिम बंगाल के अलीपुरद्वार के जलदापारा नेशनल पार्क में 250 से अधिक एक सींग वाले गैंडे हैं। पश्चिम बंगाल के ही जलपाईगुड़ी के गोरूमारा नेशनल पार्क में 50 से अधिक गैंडे हैं। भारत-नेपाल सीमा पर स्थित दुधवा नेशनल पार्क, लखीमपुर खीरी, यू.पी. में 40 से अधिक गैंडे सुरक्षित बाड़े वाले खुले, विशाल प्राकृतिक जंगलों में रह रहे हैं।

गैंडे शुद्ध शाकाहारी जीव हैं जो छोटी घास, जलकुंभी, काई, गन्ना, धान, मक्का, पेड़ों की टहनियां / छाल, जंगली झाड़ियों और बेलें, पेड़ों से अपने आप गिरे फल और बीज आदि खाकर ज़िंदा रहते हैं। चूंकि इनका शरीर विशालकाय होता है, लिहाज़ा उसे ऊर्जा देने हेतु इनके खाने की मात्रा भी बहुत अधिक होती है। एक गैंडा दिन भर में चालीस से पचास किलो तक चारा, घास और वनस्पति खा सकता है। कभी-कभी शरीर की खनिज लवणों की पूर्ति हेतु ये चट्टानों को भी चाटते हैं।

गैंडे भी कुदरत की सुंदर रचना हैं जो न सिर्फ जंगल में पर्यावरणीय संतुलन बनाते हैं बल्कि पर्यटन विभाग को जबरदस्त आय भी कराते हैं। आइये गैंडों के घर सुरक्षित रखें, इन्हें भी इस धरा पर जीने का हक दें।

 

मधु माहेश्वरी

गुवाहाटी, असम