हर महीने यहाँ राशन ही मिलेगा हमको, घर ग़रीबों के तो गोदाम न आने वाला, दीपक प्रेमी,,,,,,

अनुराग लक्ष्य, 4 अगस्त
सलीम बस्तवी अज़ीज़ी
मुम्बई संवाददाता ।
ज़िंदगी जब दौड़ती है तो रगों में बहने वाला ख़ून भी दौड़ता है और उस दौड़ में कुछ मुसाफिर तो थक हार कर बैठ जाते हैं । लेकिन कुछ मुसाफिर ऐसे भी होते हैं जो अपने जोश ओ जुनून की बदौलत अपनी मंज़िल पर पहुंचकर ही रुकते हैं।खुशी की बात है कि बस्ती जनपद का एक ऐसा ही शायर आज अपने जोश ओ जुनून की बदौलत आज एक खूबसूरत शायरों में शुमार होता है, दुनिया ए अदब जिसे दीपक प्रेमी के नाम से जानती और पहचानती है। आइए आज उसी खूबसूरत शायर की एक खूबसूरत ग़ज़ल से हम और आप लुत्फ अंदोज़ होते हैं।

1 / दिल के चोटों का कोई बाम न आने वाला,
यत्न कैसा भी करो काम न आने वाला ।

2 / प्यार का रोग है जाएगा ये धीरे-धीरे,
यूं अचानक से तो आराम न आने वाला।

3 / मैं तो नादान था हर रोज चला आता था,
कोई दूजा तो बिना काम न आने वाला।

4 / कत्ल करता है वो खंजर भी छुपा देता है,
उसके सर पर कोई इल्जाम न आने वाला।

5 / अपनी इज्जत तो बचानी है तुझे खुद बेटी,
घोर कलयुग है यहां श्याम न आने वाला ।

6 / हर महीने यहाँ राशन ही मिलेगा हमको,
घर गरीबों के तो गोदाम न आने वाला।

7 / अक्ल आनी है हमे सिर्फ तो ठोकर खा कर,
अपने हिस्से में तो बादाम न आने वाला।

8/ बात करने के लिए लाख मिलेंगे लेकिन,
कोई प्रेमी की तरह काम न आने वाला।

,,,,,पेशकश, सलीम बस्तवी अज़ीज़ी,,,,,